(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.47. अध्यायः 047
अथानुगीतापर्व-2
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
ब्रह्मणा महर्षीन्प्रति संन्यासज्ञानतपसां परमपुरुषार्थसाधनत्वोक्तिः॥ 1 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

ब्रह्मोवाच।

संन्यासं तप इत्याहुर्वृद्धा निश्चितवादिनः।
ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्था ज्ञानं ब्रह्म परं विदुः॥ 14-47-1(93702)
अतिदूरात्मकं ब्रह्म वेदविद्याव्यपाश्रयम्।
निर्द्वन्द्वं निर्गुणं नित्यमचिन्त्यगुणमुत्तमम्॥ 14-47-2(93703)
ज्ञानेन तपसा चैव धीराः पश्यन्ति तत्परम्।
निर्णिक्तमनसः पूता व्युत्क्रान्तरजसोऽमलाः॥ 14-47-3(93704)
तपसा क्षेममध्वानं गच्छन्ति परमेश्वरम्।
संन्यासनिरता नित्यं ये च ब्रह्मविदो जनाः॥ 14-47-4(93705)
तपः प्रदीप इत्याहुराचारो धर्मसाधकः।
ज्ञानं वै परमं विद्यात्संन्यासं तप उत्तमम्॥ 14-47-5(93706)
यस्तु वेद निराबाधं ज्ञानं तत्त्वविनिश्चयात्।
सर्वभूतस्थमात्मानं स सर्वविदिहोच्यते॥ 14-47-6(93707)
यो विद्वान्सहवासं च विवासं चैव पश्यति।
तथैवेकत्वनानात्वे स दुःखात्प्रतिमुच्यते॥ 14-47-7(93708)
यो न कामयते किञ्चिन्न किञ्चिदवमन्यते।
इह लोकस्थ एवैष ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ 14-47-8(93709)
प्रधानगुणतत्त्वज्ञः सर्व भूतविधानवित्।
निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते नात्र संशयः॥ 14-47-9(93710)
निर्द्वन्द्वो निर्नमस्कारो निःस्वधाकार एव च।
निर्गुणं नित्यमद्वन्द्वं प्रशमेनैव गच्छति॥ 14-47-10(93711)
हित्वा गुणमयं सर्वं कर्म जन्तुः शुभाशुभम्।
उभे सत्यानृते हित्वा मुच्यते नात्र संशयः॥ 14-47-11(93712)
अव्यक्तबीजप्रभवो बुद्धिस्कन्धमयो महान्।
महाहङ्कारविटप इन्द्रियान्तरकोटरः॥ 14-47-12(93713)
महाभूतविशाखश्च विशेषप्रतिशाखवान्।
सदापत्रः सदापुष्पः शुभाशुभफलोदयः॥ 14-47-13(93714)
आजीव्यः सर्वभूतानां ब्रह्मवृक्षः सनातनः।
एनं छित्त्वा च भित्त्वा च तत्त्वज्ञानासिना बुधः॥ 14-47-14(93715)
हित्वा सङ्गमयान्पाशान्मृत्युजन्मजरोदयान्।
निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते नात्र संशयः॥ 14-47-15(93716)
द्वाविमौ पक्षिणौ नित्यौ संक्षेपौ चाप्यचेतनौ।
एताभ्यां तु परो योन्यश्चेतनावान्स उच्यते॥ 14-47-16(93717)
अचेतनः सत्वसङ्ख्याविमुक्तः
सत्त्वात्परं चेतयतेऽन्तरात्मा।
स क्षेत्रवित्सर्वसङ्ख्यातबुद्धि-
र्गुणातिगो मुच्यते सर्वपापैः॥ ॥ 14-47-17(93718)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अनुगीतापर्वणि सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥ 47 ॥

Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Footnotes
7-47-15 हित्वा चामरतां प्राप्य जह्याद्यो मृत्युजन्मनीति क.ठ.थ. पाठः॥ 7-47-16 पक्षिणौ जीवेश्वरौ॥ 7-47-17 अचेतनस्तत्वसंघातयुक्तस्तत्वात्परं चेतयतेन्तरात्मा। स क्षेत्रज्ञस्तत्वसंघातबुद्धिर्गुणातिगो मुच्यते मृत्युपाशादिति क.थ.पाठः॥


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